Divyesh Joshi

પુરાણ જ્ઞાન : જયોતિષ
લેબલ જયોતિષ સાથે પોસ્ટ્સ બતાવી રહ્યું છે. બધી પોસ્ટ્સ બતાવો
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ભાગ્યોદય ક્યારે થાય.....?

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लग्न और भाग्योदय 


भाग्य को मजबूत करने के निम्न उपाय करने चाहिए।


बुध भाग्येश के उपाय : 

1. तांबे का कड़ा हाथ में पहने । 
2. गणेश जी की आराधना करें। 
3. गाय को हरा चारा दीजिये।   

                                                                 शुक्र भाग्येश :


1. स्फटिक की माला से शुक्र के मत्र  का जप करें। 
2.  चावल का दान करें। 
3. लक्ष्मी जी की आराधना करें।

चंद्र भाग्येश : 


1.चंद्र के मत्र  का जप करें । 
2. चांदी के गिलास में जल पिना चाहिए। 
3. शिव जी की आराधना करें।

गुरु भाग्येश :  


1. विष्णु जी की आराधना करें। 
2. गाय को रोटी  खिलाएं।
3.  पीली वस्तुओं का दान  करना चाहिए । 

शनि भाग्येश : 


1. काले वस्त्रों ,नीले वस्त्रों को कम  या न पहनें। 
2. पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं। 
3. शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। 

मंगल भाग्येश : 


1. मजदूरों को मंगलवार को मिठाई खिलाना चाहिए । 
2. लाल मसूर का दान करना चाहिए ।
3. मंगलवार को सुंदर कांड का पाठ करना चाहिए । 

सूर्य भाग्येश : 

1. गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए । 
2. सूर्य को नियमित जल देना चाहिए । 
3. सूर्य मंत्र  का जप करें।

 कुंडली के लग्न के अनुसार  भाग्योदय :


 कुंडली का प्रथम भाव लग्न होता है। 


मेष लग्न : भाग्योदय 16 वर्ष की आयु, 22 वर्ष की आयु, 28 वर्ष की आयु, 32 वर्ष की आयु, और 36 वर्ष की आयु।

वृष लग्न :  भाग्योदय 25 वर्ष की आयु, 28 वर्ष की आयु, 36 वर्ष की आयु और 42 वर्ष की आयु ।

मिथुन लग्न : भाग्योदय करने वाली आयु है 22 वर्ष, 32 वर्ष, 35 वर्ष, 36 वर्ष, 42 वर्ष। कर्क लग्न : भाग्योदय 16 वर्ष की आयु, 22 वर्ष की आयु, 24 वर्ष की आयु, 25 वर्ष की आयु, 28 वर्ष की आयु, 32 वर्ष ।

सिंह लग्न: भाग्योदय 16 वर्ष की आयु में, 22 वर्ष की आयु में, 24 वर्ष की आयु में, 26 वर्ष की आयु में, 28 वर्ष की आयु में या 32 वर्ष की आयु में हो सकता है।

कन्या लग्न:  16 वर्ष, 22 वर्ष, 25 वर्ष, 32 वर्ष, 33 वर्ष, 35 वर्ष एवं 36 वर्ष।

तुला लग्न : भाग्य का उदय 24 वर्ष की आयु में हो सकता है। यदि 24 वर्ष की आयु में भाग्योदय न हो तो इसके बाद 25 वर्ष की आयु में, 32 वर्ष की आयु में, 33 वर्ष की आयु में, 35 वर्ष की आयु ।

वृश्चिक लग्न :भाग्योदय 22 वर्ष की आयु में, 24 वर्ष की आयु में, 28 वर्ष की आयु में या 32 वर्ष की आयु ।

धनु लग्न :भाग्योदय 16 वर्ष की आयु में, 22 वर्ष की आयु में या 32 वर्ष की आयु ।

मकर लग्न : भाग्योदय 25 वर्ष की आयु में या 33 वर्ष की आयु में या 35 वर्ष की आयु में या 36 वर्ष की आयु ।

कुंभ लग्न :भाग्योदय 25 वर्ष की आयु में, 28 वर्ष की आयु में, 36 वर्ष की आयु में या 42 वर्ष की आयु ।

मीन लग्न :भाग्योदय 16 वर्ष की आयु में, 22 वर्ष की आयु में, 28 वर्ष की आयु में या 33 वर्ष की आयु ।

नौ ग्रहों को प्रसन्न और भाग्य को मजबूत करने के लिए उपाय  :

 सूर्य:  आदित्यहृदय का पाठ करना चाहिए। माता-पिता की सेवा। सूर्य को अर्द्ध जल में रोली तथा लाल पुष्प डाल कर । सोना-तांबा तथा चीनी, गुड़ का दान करें। सूर्योदय से पूर्व उठें। रविवार का व्रत करें। नमक का परहेज करें।बुजुर्गों का सम्मान करें। 

चंद्र:  भगवान शिव का ‘ऊँ नमः शिवाय’ मंत्र जप करें।  भगवान शंकर को भोग लगाएं। सोमवार का व्रत करें। सफेद वस्त्र का दान करें। पहाड़ों की यात्रा करे। माता के चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें। 

मंगल:  श्रीहनुमान भगवान के चमेली का तेल सिंदूर ,शुद्ध घी में चोला चढ़ावें। मंगल स्तोत्र का पाठ करें। इमरती, जलेवी, बूंदी तथा चूरमे का प्रसाद । भाईयों के साथ  ठीक रहै । मंगलवार का व्रत करें। पड़ोसियों, मित्रों तथा साथ में काम करने वालों से अच्छा व्यवहार रखनाचाहिए। 

बुध:  भगवती दुर्गा की पूजा करनी चाहिए।  हरे मूंग भिगोकर पक्षियों को दाना डालें। हरा चारा गायों को खिलावें।  तोतों को पिजरों से स्वतंत्रता दिलावें। नौ वर्ष से छोटी कन्याओं का  आशीर्वाद प्राप्त करें। बुधवार का व्रत रखें। मां भगवती दुर्गा का पूजा करें।  

बृहस्पति:  ब्राह्मणों का  आशीर्वाद प्राप्त करें। चने की दाल का मंदिर में दान करें। केशर का तिलक मस्तकपर लगावें। ज्ञानवर्द्धक पुस्तकों का दान करें।  
शुक्र:  वस्त्र स्वच्छ पहनने चाहिए। पत्नी का सम्मान करना चाहिए। गोमाता की सेवा करना चाहिए। गोशाला में गुड़, हरी चारा, चने की दाल गायों को खिलानाचाहिए।  ब्राह्मण को  खीर खिलाकर दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करें।  संयम से रहें। व्यवनों से बचें। 

शनि: पीपल  का पूजन करें। इमरती, उड़द की दाल, दही बड़े  बांटें। मजदूरों को तला हुआ सामान देनाचाहिए। शनिवार का व्रत करें। ताऊ, चाचा से अच्छे संबंध बनाना चाहिए। श्री हनुमान चालीसा  तथा सुंदर कांड के पाठ करें। शनिवार को तिल के तेल का दान  करें, दक्षिणा दें। 

राहु: माता सरस्वती का पाठ, पूजन करना । रसोई में  भोजन  करें। शाकाहारी होना चाहिए।  बिजली का सामान इकट्ठा न होने दें।  नानाजी से संबंध ठीक रखें। अश्लील पुस्तकें न पढ़ें। 

केतु:  भगवान श्रीगणेश जी का पूजार्चन । बच्चों को केला खिलाना चाहिए।  कुत्तों को तेल लगाकर रोटी खिलानी चाहिए।  मामाजी का आशीर्वाद प्राप्त करें।  धर्म स्थान पर ध्वजा चढ़ावें।
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જાણો સંતાન વીસે......?


सन्तान पुत्र होगा या पुत्री  ?



  • पुत्र या पुत्री योग:-


सूर्य, मंगल, गुरू पुरूष ग्रह हैं। शुक्र, चन्द्र स्त्री ग्रह है। बुध और शनि नपुंसक ग्रह है। संतान योग कारक पुरूष ग्रह होने पर पुत्र तथा स्त्री ग्रह होने पर पुत्री का सुख मिलता है। शनि और बुध योग कारक होकर विषम राशि में हो तो पुत्र व समराशि में हो तो पुत्री प्रदान करते हैं।

  • संतान पक्ष में बाधा के योग:-



  •  यदि 5th हाउस के लाॅर्ड पाप भाव (6,8,12) में हो तो संतान प्राप्ति में बाधा या विलम्ब होता है। 
  •  (6,8,12) के स्वामी का 5th हाउस में बैठना भी संतान प्राप्ति को बाधित करता है। 
  •  यदि 5th हाउस के लाॅर्ड नीच राशि में हो तो भी संतान सुख में बाधा डालता है। 
  •  बृहस्पति यदि (6,8,12) में हो तो संतान पक्ष से जुड़ी समस्याएं उपस्थित होती हैं। 
  •  बृहस्पति है नीच राशि (मकर) में होना भी संतान सुख में कमी करता है।
  • बृहस्पति जब राहु के साथ होने से पीड़ित हो तो भी संतान सुख में बाधा या विलम्ब होता हैं। 
  • 5th हाउस में पापग्रहों का शत्रु राशि में बैठना या 5th हाउस में कोई पापयोग
            बनना भी संतान प्राप्ति में बाधक बनता है।


  • संतान सुख

जन्म कुण्डली में ‘संतान योग’ यदि हो, तभी संतान की प्राप्ति होती है। लेकिन संतान के रूप में पुत्र होगा या पुत्री मिलेगी, इसकी जानकारी भी कुण्डली में उस समय पर मौजूद ग्रह-नक्षत्र बता सकते हैं।


  • पुत्र प्राप्ति के योग

अगर कुण्डली में लग्नेश पंचम में हो तथा उस पर चंद्र की पूर्ण दृष्टि हो तो पुत्र संतान होती है। लग्नेश जब गोचरवश- पंचमेश से योग करे, अपनी उच्च राशि में आए, अपनी स्वराशि में आए तब पुत्र प्राप्ति हो सकती है।

उपरोक्त कथन सिर्फ ज्योतिष पर  आधारित है संतान देना और ना देना, दोनों ही ईश्वर के हाथ है। इंसान तो केवल एक अर्ज कर सकता है, लेकिन भगवान की इच्छा हो तभी उसे संतान सुख प्राप्त होता है। किंतु संतान होगी या नहीं और संतान में क्या मिलेगा, इसके बारे में जाना जरूर जा सकता है !!

                    

કર્મ ફળ

          
 પુરાણ જ્ઞાન

  ॐ卐 कर्म - भोग ॐ卐

==>      पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता - पिता , भाई - बहन ,
    पति - पत्नि , प्रेमी - प्रेमिका , मित्र - शत्रु , सगे - सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं ,
सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।
    

                      ==> सन्तान के रुप में कौन आता है ?


==> • वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है । 
   जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है --
==>1.   *ऋणानुबन्ध  :-* पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका 
किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो , वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका 
धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा , जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।

==>2. •  *शत्रु पुत्र  :-* पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान
      बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता - पिता से मारपीट , झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी 
       भी प्रकार से सताता ही रहेगा , हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा ।

==>3.  *उदासीन पुत्र  :-* इस प्रकार की सन्तान ना तो माता - पिता की सेवा करती है और ना
    ही कोई सुख देती है । बस , उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है । विवाह होने 
      पर यह माता - पिता से अलग हो जाते हैं ।

==>4. • *सेवक पुत्र  :-* पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है । जो  बोया है , वही तो काटोगे । अपने माँ - बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी , वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा ।

>>>• आप यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं । इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है । जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है । यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी । यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा ।

>>>• इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे , उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी । यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं । यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये ।

>>>• ज़रा सोचिये , "आप कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जाओगे ? जो चले गये , वो कितना सोना - चाँदी साथ ले गये ? मरने पर जो सोना - चाँदी , धन - दौलत बैंक में पड़ा रह गया , समझो वो व्यर्थ ही कमाया । औलाद अगर अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है , खुद ही खा - कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ , वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी ।"

>>>•  मैं , मेरा , तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा , कुछ भी साथ नहीं जायेगा । साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ *नेकियाँ* ही साथ जायेंगी । इसलिए जितना हो सके *नेकी* करो *सतकर्म* करो ।

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