Divyesh Joshi

પુરાણ જ્ઞાન : શાંતિ
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શ્રાદ્ધ વીસે જાણો ...


  • जानीऐ श्राद्ध के बारे मे


ब्रह्मपुराण के ‘श्राद्ध’ अध्याय में श्राद्ध की निम्न व्याख्या है –

देशे काले च पात्रे च
 श्रद्धया विधिना च यत् ।
पित¸नुद्दिश्य विप्रेभ्यो
 दत्तं श्राद्धमुदाहृतम् ।।

 – ब्रह्मपुराण


अर्थ : देश, काल तथा पात्र (उचित स्थान)के अनुसार, पितरों को उद्देशित कर ब्राह्मणों को श्रद्धा एवं विधियुक्त जो (अन्नादि) दिया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं ।

अमावास्वादिने प्राप्ते
 गृहद्वारं समाश्रिताः ।
वायुभूताः प्रपश्यन्ति
 श्राद्धं वै पितरो नृणाम् ॥

यावदस्तमयं भानोः
 क्षुत्पिपासासमाकुलाः ।
ततश्‍चास्तंगते भानौ
 निराशादुःखसंयुताः ।

निःश्‍वस्य सुचिरं यान्ति
 गर्हयन्तः स्ववंशजम् ।
जलेनाऽपिचन श्राद्धं
 शाकेनापि करोति यः ॥ 

अमायां पितरस्तस्य 
शापं दत्वा प्रयान्ति च ॥ 

– कूर्मपुराण


अर्थ : (मृत्यु के पश्‍चात) वायुरूप बने पूर्वज, अमावस्या के दिन अपने वंशजों के घर पहुंचकर देखते हैं कि उनके लिए श्राद्ध भोजन परोसा गया है अथवा नहीं । भूख-प्यास से व्याकुल पितर सूर्यास्त तक श्राद्ध भोजन की प्रतीक्षा करते हैं । न मिलने पर, निराश और दुःखी होते हैं तथा आह भरकर अपने वंशजों को चिरकाल दोष देते हैं । ऐसे समय जो पानी अथवा सब्जी भी नहीं परोसता, उसको उसके पूर्वज शाप देकर लौट जाते हैं ।

न सन्ति पितरश्‍चेति 
कृत्वा मनसि वर्तते । 
श्राद्धं न कुरुते यस्तु 
तस्य रक्तं पिबन्ति ते ॥  

– आदित्यपुराण


अर्थ : मृत्यु के पश्‍चात पूर्वजों का अस्तित्व नहीं होता, ऐसा मानकर जो श्राद्ध नहीं करता, उसका रक्त उसके पूर्वज पीते हैं ।

श्राद्ध न करने से प्राप्त दोष


न तत्र वीरा जायन्ते
 नाऽऽरोग्यं न शतायुषः । 
न च श्रेयोऽधिगच्छन्ति
 यत्र श्राद्धं विवर्जितम् ॥ 

– मार्कण्डेयपुराण


अर्थ : जहां श्राद्ध नहीं होता, उसके घर लड़का (वीराः) नहीं जन्मता । (जन्मीं तो केवल लडकियां ही जन्मती हैं ।), उस परिवार के लोग स्वस्थ्य और शतायु नहीं होते तथा उनको आर्थिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं अथवा संतुष्टि नहीं प्राप्त होती । 
                     

કર્મ ફળ

          
 પુરાણ જ્ઞાન

  ॐ卐 कर्म - भोग ॐ卐

==>      पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता - पिता , भाई - बहन ,
    पति - पत्नि , प्रेमी - प्रेमिका , मित्र - शत्रु , सगे - सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं ,
सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।
    

                      ==> सन्तान के रुप में कौन आता है ?


==> • वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है । 
   जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है --
==>1.   *ऋणानुबन्ध  :-* पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका 
किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो , वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका 
धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा , जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।

==>2. •  *शत्रु पुत्र  :-* पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान
      बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता - पिता से मारपीट , झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी 
       भी प्रकार से सताता ही रहेगा , हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा ।

==>3.  *उदासीन पुत्र  :-* इस प्रकार की सन्तान ना तो माता - पिता की सेवा करती है और ना
    ही कोई सुख देती है । बस , उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है । विवाह होने 
      पर यह माता - पिता से अलग हो जाते हैं ।

==>4. • *सेवक पुत्र  :-* पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है । जो  बोया है , वही तो काटोगे । अपने माँ - बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी , वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा ।

>>>• आप यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं । इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है । जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है । यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी । यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा ।

>>>• इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे , उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी । यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं । यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये ।

>>>• ज़रा सोचिये , "आप कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जाओगे ? जो चले गये , वो कितना सोना - चाँदी साथ ले गये ? मरने पर जो सोना - चाँदी , धन - दौलत बैंक में पड़ा रह गया , समझो वो व्यर्थ ही कमाया । औलाद अगर अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है , खुद ही खा - कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ , वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी ।"

>>>•  मैं , मेरा , तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा , कुछ भी साथ नहीं जायेगा । साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ *नेकियाँ* ही साथ जायेंगी । इसलिए जितना हो सके *नेकी* करो *सतकर्म* करो ।

સુર્ય સ્તોત્ર


॥ सूर्यस्तोत्रम् १ ॥

अथ सूर्यस्तोत्रप्रारम्भः ।
अस्य श्रीभगवत्सूर्यस्तोत्रमहामन्त्रस्य अगस्त्य ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः ।
श्रीसूर्यनारायणो देवता । सूं बीजम् ।
आदित्याय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । अर्कायतर्जनीभ्यां नमः ।
रिं शक्तिः । यं कीलकम् । सूर्यप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
सहस्रकिरणाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । मार्ताण्डाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
दिवाकराय मध्यमाभ्यां नमः । प्रभाकराय अनामिकाभ्यां नमः । आदित्याय हृदयाय नमः । अर्काय शिरसे स्वाहा ।
भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
दिवाकराय शिखायै वषट् । प्रभाकराय कवचाय हुम् । सहस्रकिरणाय नेत्रत्रयाय वौषट् । मार्ताण्डाय अस्त्राय फट् । ध्यानम् ।
भक्ताभीष्टवरप्रदं दिनमणिं मार्ताण्डमाद्यं शुभम् ॥ १ ॥
ध्यायेत् सूर्यमनन्तशक्तिकिरणं तेजोमयं भास्वरं भक्तानामभयप्रदं दिनकरं ज्योतिर्मयं शङ्करम् । आदित्यं जगदीशमच्युतमजं त्रैलोक्यचूडामणिं
जन्ममृत्युजराव्याधिसंसारभयनाशनः ॥ ३॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः । पञ्चब्रह्ममयाकाराः येन जाता नमामि तम् ॥ २ ॥ कालात्मा सर्वभूतात्मा वेदात्मा विश्वतोमुखः । ब्रह्मस्वरूप उदये मध्याह्ने तु सदाशिवः ।
अण्डयोने कर्मसाक्षिन्नादित्याय नमो नमः ॥ ६॥
अस्तकाले स्वयं विष्णुस्त्रयीमूर्तिर्दिवाकरः ॥ ४॥ एकचक्रो रथो यस्य दिव्यः कनकभूषितः । सोऽयं भवतु नः प्रीतः पद्महस्तो दिवाकरः ॥ ५॥ पद्महस्तः परञ्ज्योतिः परेशाय नमो नमः । कमलासन देवेश कर्मसाक्षिन्नमो नमः ।
सर्वसम्पत्करं चैव सर्वाभीष्टप्रदायकम् ॥ १०॥
धर्ममूर्ते दयामूर्ते तत्त्वमूर्ते नमो नमः ॥ ७॥ सकलेशाय सूर्याय सर्वज्ञाय नमो नमः । क्षयापस्मारगुल्मादिव्याधिहन्त्रे नमो नमः ॥ ८॥ सर्वज्वरहरं चैव सर्वरोगनिवारणम् । स्तोत्रमेतच्छिवप्रोक्तं सर्वसिद्धिकरं परम् ॥ ९॥
इति सूर्यस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

યજ્ઞ કુંડ ની માહિતી

યજ્ઞ કુંડ ની માહિતી 

યજ્ઞ કુંડ કેવી રીતે બનાવવા તથા તેના માપ કેવી રીતે રાખવા માં આવે છે જે થકી યજ્ઞ નું સંપૂર્ણ ફળ ની પ્રાપ્તિ કરી શકાય તે માટે ની શરલ અને વિષતૃત માહિતી ગુજરાતી માં આપવામાં આવી છે જેનો ઉપયોગ કરી ને આપ દરેક યજ્ઞ કાર્ય ને વૈદિક પધ્ધતિથી કરી સકો. 

જેમાં કેટલા પ્રકાર ના યજ્ઞ બનાવી શકાય તથા કેવા આકાર ના બનાવાય તે બધીજ માહિતી આ પુસ્તક માં આપવામાં આવી છે .

તેના માપ તથા તેની અંદર પડતી આહુતિ ની માહિતી પણ ગુજરાતી માં આપવામાં આવી છે . તે પુસ્તક જોવા માટે નીચે આપેલી લિન્ક થી  સેવ કરી શકસો .....

તેનો ઉપયોગ અને બીજા મિત્રો ને પણ સેર કરો 
 https://drive.google.com/file/d/1FseNsuCFDfRjOGvHnNUQDqr9qtYLcUtj/view

નવગ્રહ શાંતિ ઉપાય

નવગ્રહ શાંતિ ઉપાય 

દરેક વ્યક્તિ ના જીવના માં કોઈ ને કોઈ તકલીફ હોય જ છે પણ તેમાં થી મુક્ત થવા માટે ના ઉપાય બધા પાસે હોતા નથી, તો આજે આપણે જીવન માં પ્રગતિ થાય અને ધરેલા કર્યો સિદ્ધ કરી શકીએ એના માટે જીવમાં અગત્ય ના ભાગ ભજવતા ભગવાન નવગ્રહ ના ઉપાયો વિષે થોડી માહિતી જાણીએ. 

શાસ્ત્રો અને પુરાણો એવું કેવાય કે '' ગ્રહા રાજયમ પ્રયછંતી , ગ્રહા રાજયમ હરન્તિ ચ '' એટ્લે કે ગ્રહો ના પ્રભાવે સામાન્ય માણસ રાજ્ય શુખ ભોગવી સકે અને જો ગ્રહો અનુકુલ ના હોય તો રાજશાહી જીવન જીવતો વ્યક્તિ પણ એક રંક જેવો થય જાય છે. 

તો આવા અશુભ ગ્રહો ના અશુભ ફળ ની નિવૃતિ અને શુભ ફળ ની પ્રાપ્તિ માટે બધા ગ્રહો ને પ્રશન્ન રાખવા માટે નવે ગ્રહો ની અથવા જે ગ્રહો અશુભ છે તેની શાંતિ અને શુભ ફળ ની પ્રાપ્તિ માટે જે ઉપાયો કરવા જોએ તે નીચે આપેલી લિન્ક માં છે તે લિન્ક થી સંપૂર્ણ માહિતી લઈ ને એનું અનુ શરણ કરી જીવન માં શુભ ફળ ની પ્રાપ્તિ કરીયે ...

નવગ્રહો ના શુભ ફળ ની પ્રાપ્તિ માટે ની પુસ્તક જોવા માટે અહિયાં ક્લિક કરો 

જો આ માહિતી આપણે ઉપયોગી  થય હોય તો બીજા ને જાણ કર્ષો ...

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